भारत की शिक्षा व्यवस्था आज “समग्र विकास” और “समान अवसर” जैसे सिद्धांतों पर गर्व करती है, किंतु व्यवहारिक स्तर पर इन मूल्यों की वास्तविक परीक्षा तब होती है जब हम विभिन्न विषयों और उनके शिक्षकों के साथ होने वाले व्यवहार को परखते हैं। दुर्भाग्यवश, शारीरिक शिक्षा (Physical Education) इस कसौटी पर आज भी उपेक्षा और भेदभाव का शिकार दिखाई देती है।


यह एक निर्विवाद तथ्य है कि शारीरिक शिक्षा के अध्यापकों की शैक्षणिक योग्यता, प्रशिक्षण और चयन प्रक्रिया अन्य विषयों के शिक्षकों के समान ही होती है। स्नातक से लेकर बी.पी.एड./बी.एड., परास्नातक, NET और Ph.D. तक की सभी योग्यताएँ समान मानकों और समयावधि के अंतर्गत प्राप्त की जाती हैं। वेतनमान भी समान है। इसके बावजूद, पदोन्नति, प्रशासनिक अधिकारों और नीति-निर्माण में उनकी भागीदारी सीमित रखना न केवल अन्यायपूर्ण है, बल्कि यह संस्थागत भेदभाव का स्पष्ट उदाहरण है।

यह स्थिति भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 और अनुच्छेद 16 की मूल भावना पर प्रश्नचिन्ह खड़ा करती है, जो प्रत्येक नागरिक को समानता और समान अवसर का अधिकार प्रदान करते हैं। जब योग्यता और दायित्व समान हैं, तो अवसरों में असमानता किस आधार पर उचित ठहराई जा सकती है?

समस्या की जड़ कहीं न कहीं उस पुरानी मानसिकता में निहित है, जो शारीरिक शिक्षा को अभी भी “पी.टी.आई. संस्कृति” के संकुचित दायरे में देखती है। जबकि वास्तविकता यह है कि आज का शारीरिक शिक्षा शिक्षक एक प्रशिक्षित पेशेवर है, जो खेल विज्ञान, स्वास्थ्य शिक्षा और प्रदर्शन विश्लेषण जैसे जटिल क्षेत्रों में दक्षता रखता है।

आज शारीरिक शिक्षा एक पूर्ण विकसित वैज्ञानिक अनुशासन है, जिसमें शरीर रचना विज्ञान, शरीर क्रिया विज्ञान, खेल मनोविज्ञान, बायोमैकेनिक्स और पोषण विज्ञान जैसे महत्वपूर्ण घटक शामिल हैं। यह विषय केवल खेल तक सीमित नहीं, बल्कि विद्यार्थियों के शारीरिक स्वास्थ्य, मानसिक संतुलन, अनुशासन, नेतृत्व क्षमता और जीवन कौशल के निर्माण में केंद्रीय भूमिका निभाता है।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 ने भी स्पष्ट रूप से यह स्वीकार किया है कि शिक्षा केवल बौद्धिक विकास तक सीमित नहीं हो सकती। शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य, दोनों को समान महत्व देना आवश्यक है। इसी क्रम में सी.बी.एस.ई. सहित अन्य शिक्षा बोर्डों ने भी शारीरिक शिक्षा को एक प्रमुख विषय के रूप में मान्यता प्रदान की है, जिसमें लिखित एवं प्रायोगिक दोनों प्रकार की परीक्षाएं सम्मिलित हैं। यह इस विषय की बढ़ती शैक्षणिक गंभीरता और प्रासंगिकता को दर्शाता है। इसके बावजूद, यदि नीति और व्यवहार के बीच यह अंतर बना रहता है, तो यह हमारी नीतिगत प्रतिबद्धताओं की गंभीर विफलता को दर्शाता है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा बार-बार चेतावनी दी गई है कि शारीरिक निष्क्रियता 21वीं सदी की प्रमुख स्वास्थ्य चुनौतियों में से एक बनती जा रही है। भारत जैसे युवा देश में, जहाँ बड़ी आबादी विद्यालयी शिक्षा से गुजरती है, वहाँ शारीरिक शिक्षा की उपेक्षा केवल एक शैक्षणिक त्रुटि नहीं, बल्कि एक संभावित सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट का संकेत भी है।

यह भी विचारणीय है कि भारत वैश्विक खेल मंच पर अपनी उपस्थिति मजबूत करने का संकल्प लिए हुए है। किंतु यह लक्ष्य केवल उच्च स्तरीय प्रशिक्षण केंद्रों से नहीं, बल्कि विद्यालय स्तर पर प्रतिभाओं की पहचान और पोषण से ही संभव हो सकता है। इस प्रक्रिया में शारीरिक शिक्षा के शिक्षक आधारशिला की भूमिका निभाते हैं। यदि इसी आधारशिला को कमजोर रखा जाएगा, तो शीर्ष पर उत्कृष्टता की अपेक्षा करना यथार्थ से परे होगा।

समय की मांग है कि इस विषय को केवल औपचारिकता के रूप में नहीं, बल्कि शिक्षा के एक केंद्रीय स्तंभ के रूप में स्वीकार किया जाए। इसके लिए ठोस नीतिगत हस्तक्षेप आवश्यक हैं:-
* शारीरिक शिक्षा के अध्यापकों को अन्य विषयों के समान पदोन्नति के अवसर सुनिश्चित किए जाएं।
* विद्यालयों और शिक्षा संस्थानों के प्रशासनिक एवं नेतृत्वकारी पदों पर उनकी भागीदारी अनिवार्य की जाए।
* “पी.टी.आई.” और आधुनिक “Physical Education Teacher” के बीच स्पष्ट और औपचारिक अंतर को नीति स्तर पर परिभाषित किया जाए।
* शारीरिक शिक्षा को केवल सहायक गतिविधि नहीं, बल्कि मुख्य शैक्षणिक विषय के रूप में स्थापित किया जाए।

यह मुद्दा केवल एक विषय या एक वर्ग का नहीं है, बल्कि यह शिक्षा की गुणवत्ता, सामाजिक न्याय और राष्ट्रीय स्वास्थ्य से जुड़ा हुआ प्रश्न है। यदि हम वास्तव में एक सशक्त, स्वस्थ और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी राष्ट्र का निर्माण करना चाहते हैं, तो हमें अपनी शिक्षा व्यवस्था की नींव को मजबूत करना होगा और यह नींव शारीरिक शिक्षा के बिना अधूरी है।

अब समय आ गया है कि नीति-निर्माता, शिक्षा प्रशासक और समाज—तीनों मिलकर इस उपेक्षा को समाप्त करें और शारीरिक शिक्षा को उसका अपेक्षित स्थान दें। क्योंकि जब नींव मजबूत होगी, तभी भविष्य सुदृढ़ और स्थायी बन सकेगा।

 

डॉ. शरद कुमार
निदेशक
फिजिकल एजुकेशन फाउंडेशन ऑफ़ इंडिया

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