भारत के लिए 26 नवंबर 2025 का दिन केवल एक औपचारिक घोषणा नहीं था यह हमारे खेल इतिहास का एक निर्णायक मोड़ था। ग्लास्गो में आयोजित कॉमनवेल्थ स्पोर्टस जनरल असेंबली में 74 सदस्य देशों द्वारा अहमदाबाद को 2030 राष्ट्रमंडल खेलों के शताब्दी संस्करण की मेजबानी सौंपना, भारत की बढ़ती वैश्विक प्रतिष्ठा, उत्कृष्ट खेल अवसंरचना, और युवा ऊर्जा में दुनिया के भरोसे का अभूतपूर्व प्रमाण है।

2010 के बाद दोबारा जब दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा बहु-खेल आयोजन भारत की धरती पर लौट रहा है, तब यह अवसर केवल उत्सव का नहीं, बल्कि आत्मविश्वास, जवाबदेही, और परिवर्तनकारी नीतिगत निर्णयों का भी है।

1930 में शुरू हुए राष्ट्रमंडल खेल न केवल प्रतिस्पर्धा के मंच हैं, बल्कि साझा मूल्यों-एकजुटता, निष्पक्षता और प्रगति का प्रतीक भी हैं। भारत इस यात्रा का दशकों से महत्वपूर्ण सहभागी रहा है। हमारे खिलाड़ियों ने इस मंच पर बार-बार यह सिद्ध किया है कि भारतीय प्रतिभा विश्व खेल व्यवस्था में निर्णायक भूमिका निभा सकती है।

अहमदाबाद 2030: विश्व मंच पर नए भारत का उदय

नाइजीरिया की अबुजा को पीछे छोड़ते हुए अहमदाबाद की मेजबानी भारत के उभरते खेल सामर्थ्य की वैश्विक स्वीकृति है। यह आयोजन केवल एक शहर का गौरव नहीं-यह 1.4 अरब भारतीयों की आकांक्षा, क्षमता और प्रतिबद्धता का उत्सव है। अहमदाबाद पहले ही 2036 ओलंपिक बोली के मजबूत दावेदार के रूप में दुनिया का ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर रहा है, और 2030 राष्ट्रमंडल खेल इस दिशा में आवश्यक परीक्षण, तैयारी और विश्वास अर्जित करने का अवसर प्रदान करेंगे।

खेल उ‌द्योग, अवसंरचना और रोजगार में क्रांतिकारी बदलाव की संभावना

भारत में 2030 राष्ट्रमंडल खेलों का आयोजन देश के संपूर्ण खेल उ‌द्योग के लिए एक परिवर्तनकारी युग की शुरुआत साबित हो सकता है। इस आयोजन के माध्यम से विश्वस्तरीय स्टेडियमों, अत्याधुनिक

प्रशिक्षण केंद्रों और उन्नत स्पोर्ट्स साइंस प्रयोगशालाओं के निर्माण को अभूतपूर्व गति मिलेगी, जो भारतीय खिलाड़ियों की दीर्घकालिक तैयारी और वैज्ञानिक प्रशिक्षण को नई दिशा प्रदान करेंगे। साथ ही, खेल प्रबंधन, डेटा एनालिटिक्स, स्पोर्टस मेडिसिन, पोषण विज्ञान, फिटनेस, स्पोर्ट्स टेक्नोलॉजी और इवेंट मैनेजमेंट जैसे क्षेत्रों में व्यापक अवसर खुलेंगे, जिनसे युवा पीढ़ी के लिए रोजगार और उद्यमिता के असंख्य रास्ते तैयार होंगे। इस बहुआयामी विकास के परिणामस्वरूप 2030 से 2036 के बीच भारत का खेल उ‌द्योग राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था का एक सशक्त और नया स्तंभ बनकर उभर सकता है।

हालाँकि 2030 की सफलता का मार्ग हमें 2010 दिल्ली राष्ट्रमंडल खेलों की कड़वी यादों और उनसे मिले सबकों को ध्यान में रखते हुए ही प्रशस्त करना होगा। उस समय फिजूलखर्ची, कुप्रबंधन और गंभीर अनियमितताओं ने न केवल आयोजन की गरिमा को आघात पहुँचाया, बल्कि भारत की अंतरराष्ट्रीय छवि को भी धूमिल किया था। इसलिए यह अनिवार्य है कि हम 2030 में उन त्रुटियों की पुनरावृत्ति को बिल्कुल भी स्वीकार न करें। इस बार हमारा मार्गदर्शक सिद्धांत होना चाहिए-पूर्ण पारदर्शिता, सख्त वित्तीय अनुशासन, स्पष्ट जवाबदेही और तैयारी की हर प्रक्रिया की समयबद्ध निगरानी। यही वे आधार हैं, जिन पर 2030 राष्ट्रमंडल खेलों की सफलता, और उससे आगे भारत की वैश्विक खेल नेतृत्व यात्रा, मजबूती से खड़ी होगी।

पिछले ग्यारह वर्षों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में भारतीय खेल परिदृश्य ने ऐतिहासिक बदलावों का अनुभव किया है। पहली बार खेलों को राष्ट्रीय प्राथमिकता के केंद्र में लाकर उन्हें राष्ट्र-निर्माण के प्रमुख साधन के रूप में स्थापित किया गया है। ‘खेलो इंडिया’ जैसे व्यापक जन-आंदोलन, ओलंपिक और एलीट एथलीटों के लिए टॉप्स योजना, अत्याधुनिक प्रशिक्षण सुविधाएँ, खेल बजट में निरंतर वृ‌द्धि और खिलाड़ियों से सीधे संवाद की परंपरा-इन सभी ने भारतीय खेल प्रणाली को नई ऊर्जा, पारदर्शिता और वैश्विक प्रतिस्पर्धा का दृष्टिकोण प्रदान किया है। “खेले भारत नीति-2025” और नई राष्ट्रीय खेल नीति ने खेल, शिक्षा और आर्थिक विकास को एकीकृत करके भारतीय खेलों के विकास को दीर्घकालिक दिशा दी है। अब आवश्यक है कि यही दृष्टि उतनी ही गंभीरता के साथ स्कूलों, कॉलेजों और फिजिकल एजुकेशन तंत्र के हर स्तर तक पहुँचे, ताकि खेल संस्कृति जड़ से मजबूत हो।

मेरी दृष्टि में भारत के लिए आने वाले दशक का स्पष्ट लक्ष्य तय है-2030 राष्ट्रमंडल खेलों में भारत का स्थान विश्व के शीर्ष तीन देशों में होना चाहिए। और यदि हम सही दिशा में कार्य करें, तो 2036 ओलंपिक में भारत का शीर्ष 10 में पहुँचना पूर्णतः संभव और व्यावहारिक लक्ष्य है। इसके लिए हमें “इवेंट-आधारित तैयारी” से आगे बढ़कर “सिस्टम आधारित प्रतिभा निर्माण” पर ध्यान देना होगा। संरचित प्रतिभा पहचान कार्यक्रम, हर राज्य में खेल-विशेष अकादमियाँ, स्कूल स्तर पर अनिवार्य और परिणाम-उन्मुख फिजिकल एजुकेशन, तथा 12-18 वर्ष आयु वर्ग में व्यापक प्रतिभा पूल का निर्माण-ये ही वे स्तंभ हैं जिन पर भारत की दीर्घकालिक सफलता आधारित होगी। सच यह है कि स्कूल ही भविष्य के ओलंपिक पदकों की वास्तविक प्रयोगशालाएँ हैं; हमें केवल उन्हें सही संसाधन, दिशा और अवसर देने की आवश्यकता है।

मैं युवा पीढ़ी से कहना चाहता हूँ कि 2030 और 2036 आपके जीवन के स्वर्णिम अवसर हैं-उन्हें केवल खेल प्रतियोगिताओं की तरह नहीं, बल्कि अनुशासन, स्वास्थ्य, नेतृत्व और राष्ट्र-निर्माण की यात्रा के रूप में देखें। साथ ही, सरकार और नीति-निर्माताओं के लिए मेरा स्पष्ट संदेश है कि फिजिकल एजुकेशन टीचर्स को केवल ‘पीरियड लेने वाले शिक्षक की दृष्टि से नहीं देखना चाहिए। वे भारत की खेल प्रतिभा की जड़ों के वास्तविक संरक्षक, प्रशिक्षक और प्रतिभा-शिल्पी हैं। यदि हम उन्हें सशक्त करेंगे, बेहतर प्रशिक्षण, संसाधन और सम्मान देंगे, तो खेलों की क्रांति नगरों से निकलकर गाँव-गाँव और हर स्कूल तक पहुँच सकती है। यही वह बुनियादी बदलाव है जो भारत को आने वाले वर्षों में खेल महाशक्ति के रूप में स्थापित करेगा।

भारत के लिए वर्ष 2030 केवल एक अंतरराष्ट्रीय खेल आयोजन का वर्ष नहीं है-यह एक राष्ट्रीय संकल्प, एक सामूहिक चेतना और विकसित भारत की ओर खेलों के माध्यम से उठाई जाने वाली एक ऐतिहासिक छलांग का प्रतीक है। अहमदाबाद में होने जा रहे राष्ट्रमंडल खेल न सिर्फ हमारे खिलाड़ियों की क्षमता का परिचय देंगे, बल्कि यह तय करेंगे कि भारत आने वाले वर्षों में वैश्विक खेल मानचित्र पर किस ऊँचाई पर खड़ा होगा। यह आयोजन उस नए भारत का प्रतिबिंब है, जो आत्मविश्वास, आधुनिकता और सांस्कृतिक चेतना के साथ विश्व पटल पर उभर रहा है।

यदि हम आने वाले वर्षों में ईमानदारी को अपना आधार, पेशेवर दक्षता को अपनी प्राथमिकता और दूरदर्शिता को अपनी दिशा बनाए रखें, तो 2030 राष्ट्रमंडल खेल और 2036 ओलंपिक दोनों ही भारत की खेल आकांक्षाओं को वास्तविकता में बदल सकते हैं। यह वह क्षण है जहाँ भारत न केवल पदक तालिका में चमकने की क्षमता रखता है, बल्कि पूरी दुनिया की सोच में एक जिम्मेदार, आधुनिक और भविष्य-केन्द्रित खेल महाशक्ति के रूप में अपनी जगह बना सकता है। 2030 का यह सफर वास्तव में एक आयोजन से कहीं अधिक-एक राष्ट्रीय पुनर्जागरण का अवसर है।

डॉ. पीयूष जैन,
राष्ट्रीय सचिव
फिज़िकल एजुकेशन फाउंडेशन ऑफ इंडिया

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